• June 27, 2021

भाषा शिक्षण में खेल विधियाँ

मॉण्टेसरी विधि

भाषा शिक्षण में खेल विधियाँ इटली देश की निवासी डॉ. मारिया मॉण्टेसरी ने तीन वर्ष से सात वर्ष तक की आयु के बालकों को शिक्षा देने में जिस विधि का प्रयोग

किया उसे उन्हीं के नाम से मॉण्टेसरी विधि कहा जाने लगा।

इसमें बालकों को खेल द्वारा स्वतंत्रतापूर्वक शिक्षा ग्रहण करने के अवसर प्रदान किये जाते हैं और

उनके कार्यों में शिक्षक हस्तक्षेप नहीं करता।

शिक्षक का काम प्रायः महिलाएँ करती हैं ताकि वे बालकों की भावनाओं को अच्छी तरह समझकर,

उनके साथ स्नेह का व्यवहार कर सकें।

इसमें शिक्षक बालकों की इच्छा और आवश्यकतानुसार ही मार्गदर्शन करता रहता है। इस विधि में न कोई कक्षा व्यवस्था होती है

और न कोई समयविभाग चक्र।

यह एक बालकेन्द्रित विधि है जिसमें बालकों को अपने व्यक्तित्व के विकास के लिए पूरा अवसर मिलता है।

डॉ. मॉण्टेसरी ने शिक्षण सामग्री के लिए डिडेक्टिव एपरेटस का निर्माण किया। उनका प्रयोग करते समय बालक स्वयं अपनी सफलता

और भूलों को समझता जाता है।

प्रत्येक बालक की रूचि एवं शक्ति भिन्न-भिन्न होती है अतः इस विधि में व्यक्तिगत शिक्षा पर विशेष बल दिया गया है।

इसमें बालकों की बौद्धिक शक्ति के विकास के साथ-साथ उनमें शारीरिक, सामाजिक व

भाषा सम्बन्धी विकास के लिए भी शिक्षक द्वारा प्रयत्न किये जाते हैं। 

यह विधि वैज्ञानिक दृष्टिकोण के विकास पर, खेल-खेल में शिक्षा और करके सीखना

जैसे सिद्धान्तों के अनुपालन पर विशेष बल देती है। 

मॉण्टेसरी विधि के उपकरण या साधन या वस्तुएँ सिद्धान्त –

1. खेल-खेल में शिक्षा और करके सीखना ।

उद्देश्य

1. माँसपेशियों और ज्ञानेन्द्रियों को प्रशिक्षित करना । 

2. ज्ञानेन्द्रियों के नाम

(1) आँख ( 2 ) कान ( 3 ) नाक (4) जीभ ( 5 ) त्वचा 

उपकरण या साधन-

1. खुरदरी-चिकनी तख्तियाँ।

2. लकड़ी के भिन्न आकार के सिलेण्डर।

3. लकड़ी या प्लास्टिक के रंग-बिरंगे टुकड़ों, मोतियों चार्टों,

कार्ड बोर्ड ।

4. रेगमाल के टुकड़ों पर लिखे शब्द चित्रों, शब्द रचना के सेट-कार्डों जैसे शैक्षणिक उपयोग कर बालक का ज्ञान बढ़ाना। 

भाषा शिक्षण का आधार प्रारम्भिक स्तर पर ज्ञानेन्द्रियों की शिक्षा होने से इसमें शिक्षक विभिन्न प्रकार के शैक्षणिक उपकरणों

का उपयोग करके बालकों को आँख, कान, नाक, जीभ, अँगुलियों आदि के प्रशिक्षण के लिए अवसर प्रदान करता है।

पढ़ना सीखने से पूर्व लिखना सीखने की पूर्व तैयारी के लिए चार वर्ष तक के बालकों को कागज या पट्टी पर पेन्सिल

या कूँची चलाने व घुमाने का अभ्यास देकर उनसे आकृति और चित्र बनवाये जाते हैं।

चिकने सादे कागज पर सेण्ड पेपर से बने अक्षरों के कार्डों को चिपका कर अक्षरों की आकृति को समझने का अवसर प्रदान किया जाता है।

अक्षरों की आकृति पर बार-बार अंगुली घुमाकर बालक जब उन्हें पहचानने का अभ्यास करते हैं

तब शिक्षक उनका उच्चारण करता जाता है जिससे बालक अक्षरों की ध्वनि और आकृति में सामंजस्य स्थापित कर सकें।

इसमें वर्ण से शब्द और शब्द से वाक्य तथा पढ़ना सिखाने से पूर्व लिखना सिखाने का अभ्यास देना जैसी अमनोवैज्ञानिक प्रक्रियाओं को अपनाते हैं। भाषा शिक्षण की यह एक अच्छी क्रियात्मक प्रणाली है।

इसको लागू करके बालकों को औपचारिक विद्यालयों में प्रवेश देने से पूर्व अच्छी प्रकार से तैयार किया जा सकता है।

बालोद्यान विधि (भाषा शिक्षण में खेल विधियाँ)

छोटे बालकों के शिक्षण के लिए यह एक दूसरी विधि है। इसका प्रयोग जर्मनी देश के प्रसिद्ध शिक्षा शास्त्री फ्रोबेल ने तीन से सात वर्ष तक के बालकों को शिक्षा देने के लिए किया था।

उसने पहले विद्यालय को एक उद्यान का रूप दिया जिसको किण्डर गार्डन ( बालोद्यान ) कहा जाता था।

उसका कहना था कि इस उद्यान में शिक्षक माली है और बालक फूलों के पौधे। माली का काम सामग्री जुटाना मात्र है।

पौधों को स्वतंत्रता से विकसित होने देना चाहिए इसलिए उसके द्वारा बालकों के शिक्षण के लिए

जो विधि अपनाई गई वह बालोद्यान विधि कहलाई।

इस विधि की मुख्य विशेषताएँ हैं – स्वतंत्र वातावरण, स्वत विकास की प्रक्रिया, एकता की भावना, खेलों के माध्यम से शिक्षा,

सामूहिक भावना का विकास और प्राकृतिक सौन्दर्य का निरीक्षण।

उसने शिक्षण सामग्री के नाम पर कुछ विशेष प्रकार के उपहार बनाये जिनका प्रयोग बालकों की ज्ञानेन्द्रियों को प्रशिक्षित करने,

शारीरिक शक्तियों का विकास करने एवं भाषा तथा गणित सम्बन्धी प्रारम्भिक ज्ञान देने के लिए किया जाता था।

वे उपहार इस प्रकार है-

1. आकर्षक एवं भिन्न-भिन्न रंगों से रंगी हुई ऊन की गेंद । 

2. लकड़ी की एक गेंद और घनाकार – एक गुटका ।

3. छोटे घनाकार आठ गुटकों से बना हुआ एक बड़ा घनाकार गुटका ।

4. एक बड़ा घन जो आठ आयताकारों में विभक्त होता है। 

5. एक बहुत बड़ा घन जो बीस घनों में विभक्त होता है । 

6. दो रंगों में रंगे हुए सुन्दर लकड़ी के चौकोर और त्रिभुजाकार। 

भाषा शिक्षण में फ्रोबेल ने वर्ण परिचय पद्धति का उपयोग किया जिसमें वर्णों और उनसे सम्बद्ध चित्रों में सामंजस्य स्थापित करके बालकों को वर्ण पहिचानने का अभ्यास दिया जाता है।

चित्रों और चार्टों के माध्यम से बालकों को कहानी सुनने और वार्तालाप करने का अवसर दिया जाता है। बालक लयात्मक ढंग से भावगीतों को सस्वर बोलना सीखते हैं

और इस तरह खेल-खेल में ही वे भाषा का ज्ञान प्राप्त कर लेते है ।

खेल विधि (भाषा शिक्षण में खेल विधियाँ)

सर्वप्रथम हैनरी कॉल्डवेल कुक ने भाषा की शिक्षा के लिए खेल-विधि का प्रयोग किया था।

उन्होंने बताया कि भाषा शिक्षण का कोई भी कार्य खेल की भावना से बालकों को अच्छी प्रकार सिखाया जा सकता है। उनका कहना था कि कोई भी काम बालकों के लिए खेल बन सकता है।

बशर्ते बालकों को उसमें रूचि हो और वे उसमें आनंद प्राप्त कर सकें। खेल विधि शिक्षण की सर्वोत्तम विधि है, क्योंकि इसमें बालकों की रूचि, स्वतंत्रता, क्रिया

आदि से सम्बद्ध मनोवैज्ञानिक सिद्धान्तों की पूर्ति होती है । 

भाषा शिक्षण में खेल विधि का प्रयोग सबसे अच्छा है।

हिन्दी भाषा के शिक्षण में श्रवण और पठन के साथ-साथ बालक की स्वानुभूति भी आवश्यक होती है। वर्णों, शब्दों, वाक्यांशों

और वाक्यों से सम्बद्ध चित्रित कार्डो द्वारा बालकों को अनेक प्रकार के खेल खिलाए जा सकते हैं। बालकों की टोलियाँ बनाकर वार्तालाप, संवाद, अभिनय, वाचन शिक्षण और क्रियात्मक शब्दों के खेल आयोजित किये जाने चाहिए

जिससे उनकी ज्ञानेन्द्रिया प्रशिक्षित हो जायें, पेशियाँ सक्रिय बनें। भाषायी ज्ञान में वृद्धि हो तथा शिक्षण में पूरी स्वतंत्रता मिलने से उनमें आत्म विश्वास की भावना जगे। प्रारम्भिक अवस्था में स्काउटिंग,

प्रहसन, शब्द और वाक्य रचना के खेल खिलाए जावें / अन्त्याक्षरी, एकांकी आदि कार्यक्रम चौथी-पाँचवी कक्षा में करवाना चाहिए।

कक्षा से बाहर विद्यालय स्तर पर पहेलियों के अर्थ बताना, श्रुतसाम्य शब्दों के अर्थ में अन्तर बताना, सूक्तियों और सुभाषितों को बोलना व सुलेख में लिखना,

जयन्तियों और पर्वों के अवसर पर प्रासंगिक वाद-विवाद, कविता पाठ, कवि दरबार

और कवि गोष्ठी का आयोजन करना, विभिन्न प्रतियोगिताएँ आयोजित करना जैसे अनेक भाषायी कार्यक्रम अपनाये जा सकते हैं।

भाषा शिक्षक का मुख्य लक्ष्य बालकों में प्रत्येक खेल कार्यक्रम से भाषायी कौशलों की वृद्धि करना होना चाहिए।

डाल्टन विधि (भाषा शिक्षण में खेल विधियाँ)

सन् 1920 में हेलन पार्कहर्स्ट ने डाल्टन नामक नगर के एक विद्यालय में इस विधि द्वारा शिक्षण प्रारम्भ किया।

इसके प्रमुख सिद्धान्त हैं- बाल केन्द्रित शिक्षा, व्यक्तिगत शिक्षण, स्वाध्याय पर बल, अध्ययन और

शैक्षिक प्रगति में व्यक्तिगत स्वतंत्रता, शिक्षक का कार्य मार्गदर्शन करना। इसे स्वाध्याय विधि भी कहा जाता है।

यह विधि किशोर बालकों के लिए उपयुक्त रहती है इसके अन्तर्गत बालक किसी भी विषय-कक्ष में जाकर प्रस्तुत पुस्तकों और

अध्ययन-उपकरणों के माध्यम से अपनी इच्छा और रूचि के अनुसार जितनी देर चाहें और जिस प्रकार चाहें अध्ययन कर सकते हैं।

प्रत्येक कक्ष में विषय विशेषज्ञ शिक्षक उपस्थित रहता है ताकि आवश्यकतानुसार बालक उनसे मार्गदर्शन ले सकते हैं ।

प्रत्येक छात्र को सत्र में जितना कार्य करना है अथवा ज्ञान प्राप्त करना है उसका मासिक विभाजन करके उसे अगले मास की पहली तारीख को पूरा करना होता है ।

इसे कन्ट्रेक्ट कहते है। इसे पूर्ण करने के लिए छात्र स्वयं अपनी योजना बनाकर पूरा करता है।

कमरे में पुस्तकें, यंत्र सहायक सामग्री, चार्टस, चित्र एवं प्रयोगशाला सम्बन्धी उपकरण उपलब्ध होते हैं । 

भाषा शिक्षण में इसके द्वारा उच्चारण, पठन, लेखन, रचना कार्य आदि

की शिक्षा बहुत अच्छे रूप में दी जा सकती है।

विनेट का विधि (भाषा शिक्षण में खेल विधियाँ)

अमेरिका में विनेट का नामक स्थान पर डॉ. कार्ल्टन ने प्राथमिक स्तर के बालकों को पढ़ाने के लिए

एक नया प्रयोग किया जो विनेट का विधि कहलाई है।

बालक इसके अन्तर्गत अपनी गति से स्वतंत्रतापूर्वक कार्य करता है।

एक ध्येय पत्र में निर्धारित कार्य लिख दिया जाता है जिसे बालक पूरा करता है।

शिक्षक एक मार्गदर्शक होता है जो बालकों के कार्य का निरीक्षण करता है और उन्हें प्रोत्साहित करता है।

डेक्रौली विधि

डेक्रौली नाम के एक शिक्षा शास्त्री ने मानसिक विकार वाले बालकों को पढ़ाने के लिए

जिस विधि का उपयोग किया उसे डेक्रोली विधि कहते हैं।

इस विधि में बालक की रूचि के आधार पर शिक्षा दी जाती है। भोजन, भौतिक, तत्व, सुरक्षा और कार्य क्षमता को आधार बनाकर बालक

का शिक्षण किया जाता है। इसके अन्तर्गत भाषा को शुद्ध बोलना, पढ़ना और लिखना जैसे कार्यों पर अधिक ध्यान दिया जाता है।

इसमें पुस्तक को विशेष महत्व नहीं दिया जाता।

शिक्षक स्वयं अपनी सूझ-बूझ से बालकों की रूचि के अनुसार उनकी आवश्यकताओं के कार्य करवाता रहता है। इसमें भाषा सम्बन्धी जिस

ज्ञान की आवश्यकता होती है वह बालकों को देता जाता है।

इस विधि में अनेक भाषायी कार्यक्रम अपनाये जाते हैं। भाषा शिक्षक का मुख्य लक्ष्य बालकों में प्रत्येक खेल कार्यक्रम से भाषायी कौशलों में वृद्धि का होना चाहिए।

बेसिक शिक्षा विधि  (भाषा शिक्षण में खेल विधियाँ)

भारत के राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी द्वारा प्रवर्तित बेसिक शिक्षा का एक प्रमुख सिद्धान्त मातृभाषा के माध्यम से शिक्षा प्रदान करना है।

इस पद्धति में विदेशी भाषा के स्थान पर मातृ-भाषाओं को महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है और इसके माध्यम से राष्ट्रीय जागरण और सांस्कृतिक पुनरुत्थान को बल मिला। इस विधि के सम्मुख दैनिक उपयोग की वस्तुएँ प्रस्तुत की जाती है जिनके नीचे उन वस्तुओं के नाम बड़े अक्षरों में लिखे रहते हैं। इस प्रकार अक्षर-बोध के बाद बालक को आधारभूत शिल्प की जानकारी से सम्बद्ध पुस्तकीय ज्ञान दिया जाता है।

शिल्प से ही सम्बद्ध पाठ व कविताएँ होती हैं । 

शिल्प के सम्बन्ध में पत्र व्यवहार, रिपोर्ट लिखना आदि क्रियाओं में भाषा का लिखित रूप भी विद्यमान रहता है ।

किन्तु इस पद्धति में ग्राम्य तत्व अधिक हैं और नगर के बालक इनमें कम रूचि लेते हैं।

भाषा को इसमें गौण स्थान मिलता है। यह विधि बड़ी कक्षाओं की उपेक्षा करती है।

इसके अतिरिक्त खेल की अन्य विधियाँ भी है जिनका पूर्व में वर्णन किया जा चुका है- जैसे प्रोजेक्ट विधि, निर्देशित स्वाध्याय विधि, दल विधि।


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