राजस्थान की जलवायु (Climate of Rajasthan)

राजस्थान की जलवायु विस्तृत क्षेत्र की, लम्बे समय की, वायुमण्डलीय दशाओं के औसत को जलवायु कहते है जो अक्षांश, समुद्र से दूरी, सागरतल से ऊँचाई, भौतिक प्रदेश, इत्यादि से प्रभावित रहती है। राजस्थान की औसत जलवायु उष्णकटिबंधीय मरुस्थल है। मौसम विभाग ने जलवायु को मुख्य रूप से तीन ऋतुओं में विभाजित कर रखा है शीत-ऋतु, ग्रीष्म-ऋतु, वर्षा-ऋतु

शीत-ऋतु

  • सितंबर से फरवरी तक का समय शीत-ऋतु कहलाता है
  • शरद एवं शीत ऋतुओं में विभाजित है इससे संबंधित महत्त्वपूर्ण वायुमण्डलीय दशाएँ पश्चिम-विक्षोभ, मावठ एवं शीत लहर है
  • जिसका औसत तापमान 21°C माना गया है।

ग्रीष्म-ऋतुः

  • मार्च से जून तक का समय ग्रीष्म-ऋतु कहलाता है जिसका औसत तापमान 27°C होता है।
  • इससे संबंधित महत्वपूर्ण दशाएं लू, भाभूल्या एवं आँधियाँ है।

वर्षा-ऋतुः

  • जून से सितम्बर तक का समय वर्षा-ऋतु कहलाता है जिसकी औसत वर्षा 57.5 सेंटीमीटर है।
  • सर्वाधिक वर्षा स्थान में माउंट आबू तथा जिलों में झालावाड़ में होती है।
  • मानसून, आर्द्रता जैसी दशाएं वर्षा-ऋतु से संबद्ध है।

मानसून

  • समय एवं क्षेत्र के अनुसार दिशा और स्वभाव बदलने वाली विशेष सामयिक पवनों को ही मानसून कहते है।
  • मानसून अंग्रेजी भाषा का शब्द है जो अरबी भाषा के मैसिम शब्द बना है। जिसके अनुसार मानसून दो प्रकार का होता है शीतकालीन एवं ग्रीष्मकालीन

राजस्थान में कम वर्षा के कारण:-

  1. अरावली पर्वत अरब सागरीय मानसून के समानांतर स्थित है।
  2. बंगाल की खाड़ी का मानसून राजस्थान तक आते-आते सूख जाता है।
  3. तापीय अधिकता के कारण प्राप्त आर्द्रता का वाष्पीकरण हो जाता है।

राजस्थान के जलवायु प्रदेश

राजस्थान की सापेक्ष एवं निरपेक्ष स्थिति तथा उच्चावचों के आधार पर राजस्थान में पाँच जलवायु प्रदेश पाये जाते है।

  1. अति आर्द्र जलवायु प्रदेश
  2. आर्द्र जलवायु प्रदेश
  3. उपार्द्र जलवायु प्रदेश
  4. अर्द्र-शुष्क मरुस्थलीय जलवायु प्रदेश
  5. शुष्क मरुस्थलीय जलवायु प्रदेश

राजस्थान के भौतिक प्रदेश


कोपेन के विश्व जलवायु प्रदेशों पर आधारित राजस्थान जलवायु प्रदेश- (Rajasthan Climate Region based on Köppen’s World Climate Territories)

कोपेन के विश्व जलवायु प्रदेशों पर आधारित राजस्थान जलवायु प्रदेश- (Rajasthan Climate Region based on Köppen's World Climate Territories)
कोपेन के विश्व जलवायु प्रदेशों पर आधारित राजस्थान जलवायु प्रदेश-
  • डॉ. व्लादिमीर कोपेन’ के वनस्पति के आधार पर विश्व को अनेक जलवायु प्रदोशों में बांटा है
  • इसके अनुसार वनस्पति के द्वारा ही किसी स्थान पर तापमान और वर्षा का प्रभाव ज्ञात किया जा सकता है।
  • इन्होंने अपने वर्णन में सांकेतिक शब्दों को प्रयोग किया है जिसे लेखक ने आधार बना कर राजस्थान में निम्न जलवायु प्रदेश का सीमांकन किया है:

(1) Aw या उष्णकटिबंधीय आर्द्र जलवायु प्रदेश:-

  • इस जलवायु प्रदेश में ग्रीष्म ऋतु में भीषण गर्मी पड़ती है तथा वर्षा भी अधिक ग्रीष्म ऋतु में होती है।
  • शीत ऋतु सूखी और ठण्डी होती है।
  • राजस्थान के डूंगरपुर जिले का दक्षिणी भाग तथा बांसवाड़ा जिला इस जलवायु प्रदेश के अन्तर्गत आते हैं।
  • ये क्षेत्र, वास्तव में शुष्क उष्ण कटिबन्धीय घास के मैदानों तथा सवाना तुल्य प्रदेश से बहुत कुछ साम्य रखते हैं।
  • इस प्रदेश के क्षेत्रों पर मानसूनी पतझड़ वाले वृक्ष पाये जाते हैं।

(2) Bshw जलवायु प्रदेश:-

  • यह अर्द्ध शुष्क प्रदेश है।
  • जाड़े की ऋतु शुष्क होती है। साथ ही ग्रीष्म ऋतु में भी वर्षा अधिक नहीं होती है।
  • कांटेदार झाड़ियाँ और घास यहाँ की विशेषता हैं।
  • धरातलों के पश्चिमी भाग में स्थित जिले बाड़मेर, जालौर, सिरोही, पाली, जोधपुर, नागौर, चूरू,. सीकर, झुंझुनू आदि इस जलवायु प्रदेश में आते हैं।

(3) Bwhw जलवायु प्रदेश:-

  • इस प्रदेश में शुष्क उष्ण मरुस्थलीय जलवायु की दशायें पायी जाती हैं।
  • वर्षा बहुत ही कम होती है।
  • इसके विपरीत वाष्पीकरण की क्रिया अधिक होती है। इसलिये ये मरुस्थलीय प्रदेश बन गये हैं
  • उत्तरी-पश्चिमी जोधपुर, जैसलमेर, पश्चिमी बीकानेर, हनुमानगढ़ और गंगानगर जिले इस जलवायु प्रदेश के अन्तर्गत आते हैं।
  • अतः इस प्रकार के प्रदेश राजस्थान के पश्चिमी भाग के थार मरुस्थल तक ही सीमित है।

(4) Cwg जलवायु प्रदेश:-

  • इस प्रदेश में शीत ऋतु में मौसमी पवनों से वर्षा से वर्षा नहीं होती।
  • यह ग्रीष्म के कुछ महीनों तक सीमित हैं।
  • साधारणतः वर्षा ऋतु में वर्षा होती है।
  • अरावली के दक्षिणी-पूर्वी भाग इस जलवायु प्रदेश में आते हैं।
  • उपयुक्त वर्गीकरण में वनस्पति और जलवायु के आंकड़ों पर विशेष ध्यान दिया गया है। किन्तु भू-पृष्ठीय रचना, वायुदाब में अन्तर तथा पवनों की दिशा के प्रभाव की अवहेल्ना की गई है।
  • कोपेन के सूत्र निचले मैदानों के लिए तो किसी प्रकार ठीक है, किन्तु ऊँचे भागों के लिए अनुपयुक्त सिद्ध होते हैं।

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